Tuesday, August 19, 2008

शहर.

शहर.

चल चलें इस शहर से
अब कोई चहल लगती नही यहाँ.
अब कोई मंजिल नही यहाँ.
सुनसान जीना भी क्या जीना है.
सब तो छोड़ गए
कही और बस गए.
अब तो लगता नही मन यहाँ.

चल चलें इस शहर से
अब कोई चहल लगती नही यहाँ.

याद है मुझे
जब में आकर बस गया था यहाँ
कुछ सच्चे यार मिले थे
सच कुछ सच्चे प्यार मिले थे.
मालूम नही मुझे
बसते हैं अब वो कहाँ.

चल चलें इस शहर से
अब कोई चहल लगती नही यहाँ.

वैसे जाने से पहले कुछ बात कहूँ
यारों के यार हैं.
तो कैसे इस तन्हाई को सहूँ.

नही अच्छा लगता, अब लौट आओ यहाँ.
ताकि न कहना पड़े
चल चलें इस शहर से
अब कोई चहल लगती नही यहाँ.

धीरेन्द्र चौहान. "देवा"

Monday, August 11, 2008

परदेशी मुलुक

!!! परदेशी मुलुक !!!

मैं भी जब जवान होयुं।
मैन भी तब ही देखि। स्यूं का सयौं लोग भागन लाग्यां छीन किले। तब मैन भी जानी।

जीवन माँ लोग अपुडू घर छोड़ी।
परदेशी मुलुक किले छीन जायां।
अपुडू रौन्ताल्यु उत्तराखंड छोड़ी
तत्गा दूर किले छीन जयां।

जब में थें भी घर छोड़ी जान पड़ी। मिन भी तब ही देखि।
जब अपुदा घर की याद औंदी छाई, तब मिन भी जानी।

याखा नि करदू क्वे कै सी भी प्यार, सु दुलार और स्य चिंता हर कैकी
सुख दुःख माँ साथ देनु सबुकू। और ग्वोरू की फिकर और फुन्गाणु माँ पडयाल कनु हर कैकी।

जब सास छो कैकी चिंता कु और नि मिली। मिन भी तब ही देखि ।
जब नि पूछी कैन भी हाल मेरा । तब मैन भी जानी।

अब ता में भी ज्ञानवान ह्वेयुं । मिन भी अब देखि।
किले छीन लोग भागन लाग्यां अब मिन भी जानी।

Thursday, July 31, 2008

शौणु भाई जी कु ब्व्ग्ठया !!!

दोस्तों मैंने आज तक कभी गढ़वाली में कोई रचना नही लिखी है। मगर जयाडा जी की सुंदर कविताओं से प्रेरित होकर मैंने भी एक कविता लिखने की कोशिस की है जिसे मैं आप लोगों के सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ।

शौणु भाई जी कु ब्व्ग्ठया
आज बल बाघ न मारी
खुजौण लाग्यां छीन भाई बंध सभी
देखा आज सारियों का सारी...

यखनि मिली तख नि मिली
बवन लाग्यां छन सभी भाई
रुमुक पव्डी गे अर खुज्योरू के वे
घर माँ परेशां पुरी कुटुम्दारी ...

शौणु भाई जी की ब्वे भट्याणी
घर अवा सभी रात पव्डी ग्यायी
मेरा शौणु का बखरा यानि गैन
नि के होली हमुन कभी कैकी भल्यारी॥


अब ता ब्व्ग्ठया मिली गे घर भी ल्ये गैनी
सची मरयूं पाई।
झटपट जगे आग अर सजे गैनी परात।
भली करी भाडयायी।

पडोश माँ प्रधान जब तोन सुंणी
अपुदु थैलू भी लीक आयी
ब्व्ग्ठया देखि और सोची बिचारी
तब बीस बाँट लगाई

में थे भी क्या चेनू छो
मिन भी दौड़ लगाई
एक बाँट उधार करी की
चुपचाप अपुडा घर आयी

यन भी होन्दु च दग्द्यों कभी
सोचिदी सोचिदी बखरू पकाई
प्वेटीगी भरी की टुप स्ये गयों
आज इनु बखुरु खाई॥


रचनाकार.
धीरेन्द्र सिंह चौहान॥ "देवा"

Wednesday, December 19, 2007

स्मृतियाँ

नभ से आनेनी वाली वो सूरज की वो पहली किरण
सपनो से पहले नींद का वो पहला आगमन।

वो मेरे पैरों पे चलने का पहला गमन
माँ तुझे देखने वाले वो पहले नयन

जब भी याद आये तो कुछ कहता है मन कुछ कहता है मन .

एक हलकी सी धुप अम्बर तले माँ का अंचल , वो पहला दामन ।
पहला प्यार। पहली घटा पहली फिजा का पहला अभिनन्दन.

इस धारा का पहला क्रंदन। सुकून का वो पहला अमन
प्रेम मी बिछे वो पहले पलकन, प्यार बरसाता वो पहला चमन

जब भी याद आये तो कुछ कहता है मन कुछ कहता है मन .

जब भी सुनाई दे लोरी कहीं, पलकों का बोझ वो पहला बचपन।
स्वछा, निर्मल, कोमल, माँ तेरे हाथों कि पहली तपन.

श्वेत वर्ण, पीताम्बर ओढे, सष्ट माह का वो कोमल तन।
बिना केश मी पहली बार, वो भय से कन्प्कपया बदन.

जब भी याद आये तो कुछ कहता है मन कुछ कहता है मन ।

धुल भरा है अब ये पथ, ये शहर, और ओझल मेरी अंकों से मेरा गाँव और सब जन.
ध्यान करता हूँ जब, तो हर पल सोचता है मन

क्या वही था, और क्या जो आज है, ऐसा ही होता है क्या हकीक़त का चमन।
जब भी कुछ याद आये। तो कहता है मन, कुछ कहता है मन.

Tuesday, November 27, 2007

पुकार

इस पल थम जा जरा मेरे लिए
कुछ पल सुन जा जरा मुझे मेरे लिए
मुझसे नाता तो जन्मों का है
मैं उत्तरांचल हूँ तेरा कुछ तो कर जा मेरे लिए। इस पल थम जा जरा मेरे लिए।

मैं समेटता हूँ इस धरा कि बृहद खूबसूरती
पर्वत श्रंखला, फूलों कि घाटी और देवभूमि कहलाता हूँ मैं
उन परवानों कि सहादत पर रोता हूँ मैं जिन्हें नही भुला सकते सच्चे सपूत मेरे
जरा सुन दर्द मेरा, इस पल जरा थम जा मेरे लिए।

मेरा हर सपूत सच्चा जवान है मुझे मेरी पहचान दिलाई है।
मुझे गर्व है उन शहीदों पर जिनसे आज हूँ मैं।
सोचा था उन्होने कुछ तस्वीर बदलेगी
एक नया सवेरा होगा एक नया अहसास होगा
सब अपने स्वाभिमान से मजबूत क़दमों से चलेंगे
उनका मान मेरा सम्मान है तू भी कुछ कर जा मेरे लिए,
माँ हूँ तेरी मातृभूमि हूँ तेरी इस पल जरा थम जा मेरे लिए।

तू भी तो लाराजता है खुसी से जब चार धामों कि बातें कोई करता है।
नैनीताल का रहने वाला हूँ झूठ भी कभी कह लेता है
आज मेरे हर रंग को हर बसंत को सबको बतलाना चाहता है
जाने कभी सर्म्षर हो जाता है , कहीं खो जाता है , जब मेरे पास पास नही होता तो
तो क्यों रो जाता है
मत खो मेरे लिए मत रो मेरे लिए, सुन ले एक अर्ज मेरी इसलिए इस पल जरा थम जा मेरे लिए

मैं अखंड उत्तराखंड हूँ । मैं अटल हिमालय हूँ
देवताओं का वास है मुझमे, मैं देवभूमि हूँ
मैं जानता हूँ मैं दिल हूँ तेरा, बसा ले दिल मैं मुझे मेरे लिए
कहना है आज जरा कुछ, इस पल थम जा मेरे लिए

मेरी पहचान अब भी बाक़ी है
मेरे शहीद सपूतों का सपना अब भी बाक़ी है
मैं संघर्ष के उन दिनों को नही भूल सकता
अब तेरा कुछ योगदान बाक़ी है

मेरे सपूतों ने एक सपना देखा था।
इस धरा का एक नया राज्य "उत्तराखंड" मुझे नाम दिया था।
बिना तुम्हारे मैं अधूरा हूँ, एक सपना संजो लो मेरे लिए
मैं तो सदा तुम्हारा हूँ, बस इस पल थम जा मेरे लिए।


भाई लोगों मुझे माफ़ करना अगर कोई गलती होगी । बड़ी जल्दी बाजी मीलिखा है मैने इसे अगर कोई सुझाव आप देना चाहें या कूच बदलाव चाहें तो आपका हार्दिक स्वागत है।